Tuesday, September 30, 2014

कृष्ण : जो कभी परखे ही न गए




सोचना हो, बोलना हो, समझना हो, लिखना हो, तो कृष्ण से ज्यादा महत्वपूर्ण वयक्ति खोजना मुश्किल है ऐसा नहीं कि और महत्वपूर्ण वयक्ति नहीं हुए हैं ऐसा भी नहीं है कि और महत्वपूर्ण वयक्ति नहीं होंगे, लेकिन कृष्ण का महत्व अतीत के लिए कम भविष्य के लिए ज्यादा है सच ऐसा है कि कृष्ण अपने समय से कम से कम पांच हजार वर्ष पहले पैदा हुए सभी महत्वपूर्ण वयक्ति अपने समय से पहले पैदा होते हैं, और सभी गैर- महत्वपूर्ण वयक्ति अपने समय के बाद पैदा होते है बस महत्वपूर्ण और गैर- महत्वपूर्ण वयक्ति में इतना ही फर्क है. और सभी साधारण वयक्ति अपने समय पर पैदा होते हैं
कृष्ण का व्यक्तित्व बहुत अनूठा है अनूठेपन की पहली बात तो ये है कि कृष्ण हुए तो अतीत में, लेकिन हैं भविष्य के मनुष्य अभी भी इस योग्य नहीं हो पाया कि कृष्ण का समसामयिक बन सके अभी भी कृष्ण मनुष्य की समझ से बाहर हैं I भविष्य में ही यह संभव हो पायेगा कि कृष्ण को हम समझ पायें
इसका सबसे बड़ा कारण तो यह है कि कृष्ण अकेले ही ऐसे व्यक्ति हैं जो धर्म की परम गहराइयों और उंचाईयों पर होकर भी गंभीर नहीं हैं, उदास नहीं हैं, रोते नहीं हैं साधारणतः संत का लक्षण ही रोता हुआ होना है जिंदगी से उदास, हरा हुआ, भागा हुआ कृष्ण अकेले ही नाचते हुए व्यक्ति हैं हँसते हुए, गीत गाते हुए जीसस के संबंध में कहा जाता है कि वह कभी हँसे नहीं शायद जीसस का यह उदास वयक्तिव और सूली पर लटका हुआ उनका शरीर ही हम दुखीचित लोगों को बहुत आकर्षण का कारण बन गया महावीर और बुद्ध भी बहुत गहरे अर्थों में जीवन के विरोधी हैं कोई और जीवन है परलोक में, कोई मोक्ष है, उसके पक्षपाती है समस्त धर्मो ने दो हिस्से कर रखे हैं जीवन के एक वह जो स्वीकार योग्य है और एक वह जो इनकार के योग्य है
कृष्ण अकेले ही इस समग्र जीवन को पूरा ही स्वीकार कर लेते हैं इसलिए, इस देश ने सभी अवतारों को आंशिक अवतार कहा है, कृष्ण को पूर्ण अवतार कहा है. राम भी अंश ही हैं परमात्मा के, लेकिन कृष्ण पुरे ही परमात्मा हैं यह कहने का कारण है कि कृष्ण ने सभी कुछ आत्मसात कर लिया है
अलबर्ट श्वीत्जर ने भारतीय धर्म की आलोचना में एक बड़ी कीमत की बात कही है, और वह यह है कि भारत का धर्म जीवन-निषेधक, ‘लाइफ निगेटिवहै यह बात बहुत दूर तक सच है, यदि कृष्ण को भुला दिया जाये और यदि कृष्ण को भी विचार में लिया जाये तो यह बात एकदम ही गलत हो जाती है और श्वीत्जर यदि कृष्ण को समझते तो ऐसी बात न कह पाते लेकिन कृष्ण का कोई व्यापक छाया भी हमारे चित्त पर नहीं पड़ी वे अकेले दुःख के एक महासागर में नाचते हुए एक छोटे से द्वीप हैं या ऐसा हम समझें कि उदास और निषेध और दमन और निंदा के बड़े मरुस्थल में एक बहुत छोटे- से नाचते हुए मरूदन हैं वह हमारे पुरे जीवन की धारा को नहीं प्रभावित कर पाए हम ही इस योग्य न थे, हम उन्हें आत्मसात न कर पाए शायद आनेवाले भविष्य में हम कृष्ण को समझने में योग्य हो सकेंगे अतीत कृष्ण को समझने में योग्य नहीं हो सके
जिसे हम नहीं समझ पाते उसे हम भगवान कहना शुरू कर देते हैं, उसकी पूजा शुरू हो जाती है भगवान कहने का मतलब है कि जैसे हम भगवान को नहीं समझ पा रहे हैं वैसे ही इस वयक्ति को नहीं समझ पा रहे हैं जैसे भगवान सदा ही जानने को शेष रह जाता है वैसे ही कृष्ण भी शदियों से जानने- समझने के लिए शेष रह गए हैं
लेकिन अब वक्त करीब आ रहा है जब कृष्ण की पूजा से अर्थ नहीं होगा, कृष्ण को जीना शुरू हो सकेगा
बुद्ध ने कहा है, जन्म दुःख है,जीवन दुःख है, जरा दुःख है, मृत्यु दुःख है, ये सब दुःख है दुःख अब मिटाए जा सकेंगे जन्म दुःख नहीं होगी- न माँ के लिए न बेटे के लिए जीवन दुःख नहीं होगा, बीमारियाँ समाप्त की जा सकेंगी जरा नहीं होगी और बुढ़ापे से आदमी को जल्दी ही बचा लिया जायेगा और जीवन को भी लंबा किया जा सकता है तब विचारणीय यह नहीं होगा कि आदमी क्यूँ मर जाता है, विचारणीय यह होगा कि आदमी इतना लंबा क्यूँ जिए उस दिन बुद्ध का वचन जन्म दुःख है, मृत्यु दुःख है, बहुत समझना मुश्किल हो जायेगा उस दिन कृष्ण की बांसुरी, कृष्ण के गीत और कृष्ण का नृत्य सार्थक हो सकेगा तब जीवन सुख है, इसके फूल चारो तरफ खिल जायेंगे इन फूलों के बीच में नग्न खड़े हुए महावीर का संदर्भ खो सा जायेगा इन फूलों के बीच में जीवन के प्रति पीठ करके जानेवाले वयक्तित्व का अर्थ खो जायेगा भविष्य में दुःख कम होता जायेगा और सुख बढ़ता जायेगा, इसलिए मैं सोचता हूँ कि कृष्ण की उपयोगिता रोज रोज बढती जानेवाली है

                               अपने पुराने ब्लॉग “ गोहार”(29/08/2013) से।  

कृष्ण का अर्थ



कृष्ण शब्द का अर्थ होता है, जिस पर संसारी चीजें खिचती हों, जो केंद्रीय चुंबक का काम करे

कृष्ण शब्द का अर्थ होता है, केंद्र। कृष्ण शब्द का अर्थ होता है, जो आकृष्ट करे, जो आकर्षित करे; सेंटर ऑफ ग्रेविटेशन, कशिश का केंद्र। कृष्ण शब्द का अर्थ होता है, जिस पर संसारी चीजें खिचती हों, जो केंद्रीय चुंबक का काम करे। प्रत्येक व्यक्ति का जन्म एक अर्थ में कृष्ण का जन्म है, क्योंकि हमारे भीतर जो आत्मा है, वह कशिश का केंद्र है। वह सेंटर ऑफ ग्रेविटेशन है जिस पर सब चीजें खिंचती हैं और आकृष्ट होती हैं। शरीर खिंच कर उसके आस-पास निर्मित होता है, परिवार खिच कर उसके आस-पास निर्मित होता र्है, समाज खिंच कर उसके आस-पास निर्मित होता है, जगत खिंच कर उसके आस-पास निर्मित होता है। वह जो हमारे भीतर कृष्ण का केंद्र है, आकर्षण का जो गहरा बिंदु है, उसके आस-पास सब घटित होता है। तो जब भी कोई व्यक्ति जन्मता है, तो एक अर्थ में कृष्ण ही जन्मता है। वह जो बिंदु है आत्मा का, आकर्षण का, वह जन्मता है। और उसके बाद सब चीजें उसके आस-पास निर्मित होनी शुरू होती हैं। उस कृष्ण-बिंदु के आस-पास क्रिस्टोलाइजेशन शुरु होता है और व्यक्तित्व निर्मित होते हैं। इसलिए कृष्ण का जन्म एक व्यक्ति विशेष का जन्मपात्र नहीं है, बल्कि व्यक्तिमात्र का जन्म है।
अंधेरे का, कारागृह का, मृत्यु के भय का अर्थ है। लेकिन हमने कृष्ण के साथ उस क्यों जोड़ा होगा? मैं यह नहीं कह रहा हूं कि जो कृष्ण की जिंदगी में घटना घटनी होगी कारागृह में, वह नहीं घटी है। मैं यह भी नहीं कह रहा हूं कि जो बंधन में पैदा हुए होंगे, वह नही हुए हैं। मैं इतना कह रहा हूं कि वे बंधन में हुए हो या न हुए हों, वे कारागृह में जन्मे हों या न जन्में हो, लेकिन कृष्ण जैसा व्यक्ति जब हमें उपलब्ध हो गया तो हमने कृष्ण के व्यक्तित्व के साथ वह सब समाहित कर दिया है जो कि प्रत्येक आत्मा के जन्म के साथ समाहित है।
ध्यान रहे, महापुरुषों की कथाएं जन्म की हमेशा उलटी चलती हैं। साधारण आदमी के जीवन की कथा जन्म से शुरू होती है और मृत्यु पर पूरी होती है। उसकी कथा में एक सिक्केंस होता है, जन्म से लेकर मृत्यु तक। महापुरुषों की कथाएं फिर से रिट्रास्पेक्टिवली लिखी जाती हैं। महापुरुष पहचान में आते हैं बाद में। और उनकी जन्म की कथाएं फिर बाद में लिखी जाती हैं। कृष्ण जैसा आदमी जब हमें दिखाई पड़ता है तब तो पैदा होने के बहुत बाद दिखाई पड़ता है। वर्षों बीत गए होते हैं उसे पैदा हुए। जब वह हमें दिखाई पड़ता है तब वह कोई चालीस-पचास साल की यात्रा कर चुका होता है। फिर इस महिमावान, इस अद्भुत व्यक्ति के आस-पास कथा निर्मित होती है। फिर हम चुनाव करते हैं इसकी जिंदगी का। फिर हम रीइंटरप्रीट करते हैं। फिर से हम इसके पिछले जीवन में से घटनाएं चुनते हैं, घटनाओं का अर्थ देते हैं।
इसलिए मैं आपसे कहूं कि महापुरुषों की जिंदगी कभी भी ऐतिहासिक नहीं हो पाती है, सदा काव्यात्मक हो जाती है। पीछे लौट कर निर्मित होती है। पीछे लौट कर जब हम देखते हैं तो हर चीज प्रतीक हो जाती है और दूसरे अर्थ ले लेती है, जो अर्थ घटते हुए क्षण में कभी भी न रहे होंगे। और फिर कृष्ण जैसे व्यक्तियों की जिदंगी एक बार नहीं लिखी जाती, हर सदी बार-बार लिखती है। हजारों लोग लिखते हैं। जब हजारों लोग लिखते हैं तो हजार व्याख्याएं होती चली जाती हैं। फिर धीरे-धीरे कृष्ण की जिंदगी किसी व्यक्ति की जिंदगी नहीं रह जाती। कृष्ण एक संस्था हो जाते हैं। एक इंस्टीटयूशन हो जाते हैं। फिर वे समस्त जन्मों का सारभूत हो जाते हैं। फिर मनुष्य मात्र के जन्म की कथा उनके जन्म की कथा हो जाती है।
इसलिए व्यक्तिवाची अर्थों में मैं कोई मूल्य नहीं मानता हूं। कृष्ण जैसे व्यक्ति व्यक्ति नहीं रह जाते। वे हमारे मानस के, हमारे चित्त के, हमारे कलेक्टिव माइंड के प्रतीक हो जाते हैं। और हमारे चित्त ने जितने भी जन्म देखे है, वे सब उनमें समाहित हो जाते हैं।
इसे ऐसा समझें। एक बहुत बड़े चित्रकार ने एक स्त्री का चित्र बनायाएक बहुत सुंदर स्त्री का चित्र। लोगों ने उससे पूछा कि यह कौन स्त्री है, जिसके आधार पर इस चित्र को बनाया? उस चित्रकार ने कहाः यह किसी स्त्री का चित्र नहीं है। यह लाखों स्त्रियां जो मैंने देखी हैं, सबका सारभूत है। इसमें आंख किसी की है, इसमें नाक किसी की, इसमें ओठ किसी के हैं, इसमें रंग किसी का है, इसमें बाल किसी के है, ऐसी स्त्री कही खोजने से नहीं मिलेगी, ऐसी स्त्री सिर्फ चित्रकार देख पाता है। और इसलिए चित्रकार की स्त्री पर बहुत भरोसा मत करना, उसको खोजने मत निकल जाना, क्योंकि जो मिलेगी वह नहीं, साधारण स्त्री मिलेगी। इसलिए दुनिया बहुत कठिनाई में पड़ जाती है क्योंकि हम जिन स्त्रियों को खोजने जाते हैं वे कहीं हैं नहीं, वे चित्रकारों की स्त्रियां हैं, कवियों की स्त्रियां हैं, वे हजारों स्त्रियों का सारभूत हैं। वे इत्र हैं हजारों स्त्रियों का। वे कहीं मिलने वाली नहीं है। वे हजारों स्त्रियां मिल-जुल कर एक हो गई हैं। वह हजारों स्त्रियों के बीच में से खोजी गई धुन है।
तो जब कृष्ण जैसा व्यक्ति पैदा होता है, तो लाखों जन्मों में जो पाया गया है, उस सबका सारभूत उसमें समा जाता है। इसलिए उसे व्यक्तिवाची मत मानना। वह व्यक्तिवाची है भी नहीं। इसलिए अगर उसे कोई इतिहास में खोज करने जाएगा तो शायद कहीं भी न पाए। कृष्ण मनुष्य मात्र के जन्म के प्रतीक बन जाते हैंएक विशेष मनुष्यता के, जो इस देश में पैदा हुई; इस देश की मनुष्यता ने जो अनुभव किया, वह उनमें समा जाता है। जीसस में समा जाता है किसी और देश का अनुभव, वह सब समाहित हो जाता है। हम अपने जन्म के साथ जन्मते हैं और अपनी मृत्यु के साथ मर जाते हैं। कृष्ण के प्रतीक में जुड़ता ही चला जाता है। अनंत काल तक जुड़ता चला जाता है। उस जोड़ में कभी कोई बाधा नहीं आती। हर युग उसमें जुड़ेगा, हर युग उसमें समृद्धि करेगा, क्योंकि और अनुभव इकट्ठे हो गए होंगे। और वह उस कलेक्टिव आर्च टाइप में जुड़ते चले जाएंगे।
लेकिन मेरे लिए जो मतलब दिखाई पड़ता है, वह मैंने आपसे कहा। ये घटनाएं घट भी सकती हैं, ये घटनाएं न भी घटी हों। मेरे लिए घटनाओं का कोई मूल्य नहीं है। मेरे लिए मूल्य कृष्ण को समझने का है कि इस आदमी में ये घटनाएं कैसे हमने देखीं। और अगर इनको हम ठीक से देख सकें तो ये घटनाएं हमें अपने जन्म में भी दिखाई पड़ सकती है वह अपनी मृत्यु तक पहुंचते-पहुंचते अपनी मृत्यु में भी कृष्ण की मृत्यु के तालमेल को उपलब्ध हो सके।